क्षेत्रीय छत्रपों में सबसे अलग छवि वाले नेता नीतीश कुमार की केंद्र से कुछ अलग तरह की झड़प होती रहती है जिसमे इन दिनों सबसे महत्वपूर्ण बना हुआ है केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल से मोतिहारी में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना. जिसमे वो सब कुछ शामिल है जो आजादी के बाद से ही बार-बार देशवासियों विशेषकर बिहारवासियों को मथता रहा है चाहे केन्द्र राज्य संबंध हों या समावेशी विकास की बात. वैसे बिहार ही क्यों पूरे देश में ही समावेशी विकास के दर्शन नहीं होते जिस कारण जनता का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी बनने को मजबूर है, भले ही नीतीश भी ये कहें कि प्रवास करना बिहारवासियों के स्वाभाव के कारण है. मुझे लगता है ये मजबूरी ज्यादा है . नीतीश और केंद्र में केंद्र राज्य संबंध से लेकर समावेशी विकास तक की बातें और नोक-झोंक सब कुछ शामिल है, नीतीश आते -जाते केंद्र को चिढ़ाने से लेकर उलाहने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते.
एक बात का जिक्र करना यहाँ उचित होगा कि मोतिहारी बिहार के पूर्वी चम्पारण का जिला मुख्यालय है जहाँ से महात्मागांधी ने स्वतंत्रता संघर्ष की शुरुआत की थी. बुनियादी शिक्षा की अवधारणा को यहीं जमीन पर उतारा था, जहाँ विश्वविद्यालय से पहले हवाई अड्डे की जरुरत बताई जा रही है. वैसे सुनने में तो यहाँ तक आ रहा है कि केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने हवाई अड्डा ना होना भी एक कारण बताया है सेंट्रल यूनिवर्सिटी की स्वीकृति पर विचार नहीं करने का, वैसे ये तर्कपूर्ण कारण नहीं हो सकता.
मुझे लगता है कि विश्वविद्यालय का काम मानव संसाधन को बढ़ाना है जहाँ शैक्षणिक योग्यता कम है अगर वहाँ शैक्षणिक संस्थाओं को बढ़ावा देंगे तो उसमे बढोतरी कई गुना हो सकती है परन्तु अगर विकसित स्थान पर ऐसे बड़े संस्थानों को प्रतिष्ठित किया जाता है तो उस संस्थान कि उत्पादकता कम होगी, साथ ही पलायन की समस्या से भी स्थानीय समाज को दो चार होना पड़ता है, आज पलायन इन्ही नीतियों का एक बहुत बुरा परिणाम है जो हम सबके सामने है. हमारे संस्थानों और इसके हुक्मरानों को ये नहीं भूलना चाहिय कि असंतुलित विकास काफी सारी समस्याओं को पैदा करती हैं जो समाज और व्यवस्था दोनों के लिए उथल-पुथल का कारण बनती हैं. वैसे मोतिहारी का अपना ऐतिहासिक महत्व काफी है क्योंकि महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आन्दोलन कि शुरुआत के लिए इसी जगह को चुना था तब कभी ये स्थान राजेन्द्र बाबु, जे. बी. कृपलानी के साथ-साथ कई अन्य राष्ट्रीय नेताओं की प्रशिक्षण स्थली के रूप में प्रख्यात हुआ था. तो अब वहाँ एक अदद विश्वविद्यालय क्यों नहीं बन सकता . भारत पर लगभग दो शताब्दियों तक राज करने वाले अंग्रेज भी कभी-कभी स्थानीयता को महत्व दिया करते थे तो हम क्यों नहीं दे सकते, हमें तो देश में ऐसी भावना का संचार करनी चाहिए कि लगे कि व्यवस्था सबके लिए काम करती है ना कि किसी विशेष स्थान के लिए. आज आई.आई.टी रुड़की सिविल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सिरमौर बना हुआ है जिसकी शुरुआत स्थानीय युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए शुरू कि गयी थी ताकि वे लोक निर्माण के कार्यों में सहयोग कर सकें विशेष रूप से गंगा नहर के रखरखाव सहित इन्ही तरह के अन्य परियोजनाओं में सहायता करने के लिए. आरम्भ में ये थॉमसन कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग के नाम से चलता रहा जो बाद में रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज और अब रुड़की आई.आई.टी है जो सिविल इंजीनियरिंग हेतु एक बड़ा प्लेटफार्म है.
मोतिहारी आज ऐसे युवाओं का जमघट बन गया है जहाँ चुटकी बजाते कर्मचारी चयन आयोग, बैक पी.ओ जैसी नौकरियों पर अपना दावा जमा लेते हैं यहाँ तक कि अमिताभ बच्चन के करोड़पति कार्यक्रम को भी अपनी क्षमता दिखा देते हैं लेकिन विश्वविद्यालय के नाम पर उन्हें दिल्ली, महाराष्ट्र, और दक्षिण भारत का मूंह देखना पड़ता है. अनचाहे रूप से बिहार का बहुत सारा पैसा बिहार से बाहर चला जाता है मोटी फीस और कमरा किराया के नाम पर. सचमुच उत्साहियों कि एक मुख्य स्थली है मोतिहारी. लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं, एडमिशन और इसके चक्कर में ही काफी सारी उर्जा खर्च होती है यहाँ के छात्रों की. एक मुख्य कारण ये भी है कि लगभग नब्बे के दशक से ही यहाँ के शासक और प्रशासक दोनों अपने बच्चों को पढाने के लिए बाहर का रुख करने लगे और साधारण जनता हाशिए पर चली गयी, उन लोगों ने अपनी प्रतिष्ठा तो समाज में बना ली लेकिन बिहार की प्रतिष्ठा जाती रही. शायद ऐसी स्थापनाएं धीरे-धीरे इस दाग को धो पाए.
मुझे लगता है दूसरी हरित क्रांति कैसे हो इसके लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरुरत होगी जिसे इस संभावित विश्वविद्यालय से और भी ज्यादा बढ़ाया जा सकता है स्थानीयता को महत्व देकर और अनुसंधान और विकास को आगे बढ़ाकर. वैसे इसकी परिकल्पना बिहार के मुख्यमंत्री और लोगों के मन में घर करने लगा है. हरित क्रांति पटना और दिल्ली से नहीं वरन ऐसी जगह से होगी जहाँ जमीन हो और काम करनेवाले लोग हों. मोतिहारी से बाहर जाने वाले हजारों लोगों के लिए ये सम्मान की बात होगी कि यहाँ एक बड़े संस्थान की स्थापना हो जिससे उन्हें बाहर जाने के झंझटों से मुक्ति मिल सके उन्हें प्रशिक्षण के लिए दूर ना जाना पड़े और स्थानीयता को महत्व मिल सके मोतिहारी के साथ बेतिया, बगहा, शिवहर सभी संबद्ध हैं शिक्षा की ढांचागत कमी से. कृषि यहाँ के लिए आशाओं के नए द्वार खोल सकती है फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और संबद्ध व्यावसायिक प्रशिक्षण एक नए आकाश को खोल सकती है जिससे यहाँ के किसानों को फायदा होगा फल और सब्जी उत्पादन में भी इस जगह का कोई सानी नहीं है लेकिन बेहतर शिक्षा-दीक्षा के अभाव में सब बेकार है. कभी लालू प्रसाद ने सब्जियों को दिल्ली भिजवाने का असफल प्रयत्न किया था लेकिन मेट्रो वालों ने उन्हें सफल नहीं होने दिया.
कोई विश्वविद्यालय केवल शिक्षा के कुछ आयामों पर आधारित नहीं होता बल्कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी बढ़ाने में अपना योगदान देता है.जरुरत है एक नई सोच और दिशा कि ताकि महात्मा गांधी का चम्पारण जाना केवल आजादी की बात होकर ना रह जाये बल्कि वो असली आजादी में तब्दील हो सके जिसका विस्तार प्रत्येक गाँव और घर तक हो. और आंदोलनरत मोतिहारी गया के बुद्ध सा शांत और प्रसन्नचित्त बना रहे.
